गणेश चतुर्थी के दिन मनाया जाता है चौठचंद्र, जानिए इस खास पर्व का महत्व, मंत्र और कहानी

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इसी दिन चौठचंद्र भी मनाया जाता है। यह महान पर्व उत्तर भारत खास कर बिहार के मिथिला में बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस पर्व में लोग विधि-विधान के साथ चंद्रमा की पूजा करते हैं। इसके लिए घर की महिलाएं पूरा दिन व्रत करती हैं और शाम के समय चांद के साथ गणेश जी की पूजा करती हैं। यह पर्व चौठचन्द्र, चौरचन या चोरचंदा आदि नामों से भी जाना जाता है। पौराणिक शास्त्रों में इसे कलंक चतुर्दशी भी कहा गया है।

यह पर्व काफी हद तक महान पर्व छठ से मिलता जुलता है छठ पूजा में भगवान भास्कर की आराधना होती है जबकि चौरचन में चंद्रमा की पूजा होती है। मिथिला के अधिकांश पर्व-त्योहार मुख्य तौर पर प्रकृति से ही जुड़े होते हैं। मिथिला के लोगों का जीवन प्राकृतिक संसाधनों से भरा-पूरा है, उन्हें प्रकृति से जीवन के निर्वहन करने के लिए सभी चीजें मिली हुई हैं और वे लोग इसका पूरा सम्मान करते हैं। इस प्रकार मिथिला की संस्कृति में प्रकृति की पूजा उपासना का विशेष महत्व है और इसका अपना वैज्ञानिक आधार भी है।

कैसे मनाई जाती है चौठचंद्र?
सूर्यास्त होने और चंद्रमा के प्रकट होने पर घर के आंगन में सबसे पहले अरिपन (मिथिला में कच्चे चावल को पीसकर बनाई जाने वाली अल्पना या रंगोली) बनाया जाता है। उस पर पूजा-पाठ की सभी सामग्री रखकर गणेश तथा चांद की पूजा करने की परंपरा है। इस पूजा-पाठ में कई तरह के पकवान जिसमें खीर, पूड़ी, पिरुकिया (गुझिया) और मिठाई में खाजा-लड्डू तथा फल के तौर पर केला, खीरा, शरीफा, संतरा आदि चढ़ाया जाता है।

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घर की बुजुर्ग स्त्री या व्रती महिला आंगन में बांस के बने बर्तन में सभी सामग्री रखकर चंद्रमा को अर्पित करती हैं, यानी हाथ उठाती हैं। इस दौरान अन्य महिलाएं गाना गाती हैं ‘पूजा के करबै ओरियान गै बहिना, चौरचन के चंदा सोहाओन’ यह दृश्य अत्यंत मनोरम होता है।

चौठचंद्र की पूजा में दही का खास महत्व
चौरचन पूजा यहां के लोग सदियों से इसी अर्थ में मनाते आ रहे हैं। पूजा में शरीक सभी लोग अपने हाथ में कोई न कोई फल जैसे खीरा व केला रखकर चांद की अराधना एवं दर्शन करते हैं। चैठचंद्र की पूजा के दैरान मिट्टी के विशेष बर्तन, जिसे मैथिली में अथरा कहते हैं, में दही जमाया जाता है। इस दही का स्वाद विशिष्ट एवं अपूर्व होता है।

चौठचंद्र पूजा का मंत्र
चौठचंद्र की पूजा में एक विशेष श्लोक पढ़ा जाता है :
सिंहप्रसेन मवधीत सिंहोजाम्बवताहत:।
सुकुमारक मारोदीपस्तेह्यषव स्यमन्तक:।।

क्यों मनाते हैं चौठचंद्र?
माना जाता है कि इस दिन भगवान गणेश अपने वाहन मूषक के साथ कैलाश पर घूम रहे थे। तभी अचानक चंद्र देव उन्हें देखकर हंसने लगे, गणेश जी को उनके हंसने की वजह समझ नहीं आई। उन्होंने चंद्र देव से पूछा कि आप क्यों हंस रहे हैं। इसका जवाब देते हुए चंद्र देव ने कहा कि वह भगवान गणेश का विचित्र रूप देख कर हंस रहे हैं। साथ ही उन्होंने अपने रूप का बखान भी किया। गणेश जी को चंद्र देव की मजाक उड़ाने की प्रवृत्ति पर क्रोध आया। उन्होंने चंद्र देव को यह श्राप दिया कि तुम्हें अपने रूप पर बहुत अभिमान है कि तुम बहुत सुंदर दिखते हो लेकिन आज से तुम कुरूप हो जाओ। जो कोई भी व्यक्ति तुम्हें देखेगा उसे झूठा कलंक लगेगा। कोई अपराध न होने के बावजूद भी वह अपराधी कहलाएगा।

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श्राप सुनते ही चंद्र देव का अभिमान चूर चूर हो गया। उन्होंने गणेश जी से क्षमा मांगी और कहा भगवन् मुझे इस श्राप से मुक्त कीजिए। चंद्र देव को पश्चाताप करते देख गणेश जी ने उन्हें क्षमा कर दिया। श्राप पूरी तरह से वापस नहीं लिया जा सकता था इसलिए यह कहा गया कि “जो आज की तिथि में चांद के पूजा के साथ मेरी पूजा करेगा, उसको कलंक नहीं लगेगा” तब से यह प्रथा प्रचलित है।

चांद की पूजा सभी धर्मों में है। मुस्लिम धर्म में चांद का काफी महत्व है। इसे अल्लाह का रूप माना जाता है। अमुक दिन चांद जब दिखाई देता है तो ईद की घोषणा की जाती है। चांद देखने के लिए लोग काफी व्याकुल रहते हैं।